श्रीमद्भगवद्गीता ही क्यों?

यह आप सब जानते हैं कि मनुष्य योनि बहुत-बहुत-बहुत अधिक मूल्यवान है, बड़ी मुश्किल से मिलती है यह। तभी तुलसीदासजी ने कहा हैः

बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।

क्यों है मानव जीवन इतना दुर्लभ? क्योंकि इसी मानव जीवन में जीव शाश्वत आनन्द प्राप्त कर सकता है। यहाॅं तक कि इसी जीवन में जीव उस अवस्था को भी प्राप्त कर सकता है जहाॅं प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द है। ऐसा आनन्द प्राप्त करना भक्ति से ही संभव है।

यह दुर्लभ मानव जीवन कलियुग में पाना तो बड़े ही भाग्य की बात है। क्योंकि कलियुग में मनुष्य की आयु बहुत थोड़ी है, इसे मात्र 100 वर्ष माना गया है। अतः मनुष्य को कलियुग में बहुत थोड़े समय के लिये संयमित जीवन व्यतीत करना होता है। इसके अतिरिक्त कलियुग में मात्र भक्ति में लगने से ज्ञान और वैराग्य स्वतः प्राप्त हो जाते हैं(भागवतम्)। इसी कारण देवता भी कलियुग में मानव जीवन पाने के लिये लालायित रहते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अहैतुकी कृपा से हम सबको न केवल मानव जीवन दिया है अपितु कलियुग में दिया है। तुलसीदासजी ने कहा है-

 कबहुॅुक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।

अर्थात् यह मानव जन्म हमें हमारे किसी पुरुषार्थ के कारण नहीे मिला है, यह तो भगवान की अहैतुकी कृपा से मिला है। और देखिये भगवान की कृपा की पराकाष्ठा- उन्होंने हमें यह जन्म भारत में दिया है। भारत में ऐसी क्या विशेषता है? भारत में जैसा शुद्ध भक्ति का वातावरण है वैसा और कहीं नहीं है। अब जब हम सब पर भगवान ने इतनी महान कृपा की है तब इसे गवाँ देने से बढ़कर मूर्खता शायद हो ही नहीं सकती।

अतः बिना एक भी क्षण गवाॅंये हमें भगवद्भक्ति में लग जाना चाहिये, जिससे हम मानव जीवन का उद्देश्य इस शरीर की मृत्यु से पहले प्राप्त कर लें।

कैसे प्राप्त करें इस जीवन का उद्देश्य ?

श्रीमद्भगवद्गीता स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकली दिव्य वाणी है, अतः यह किसी भी अन्य ग्रंथ से भिन्न है यह दिव्य है। श्रीकृष्ण ने भागवतम् में कहा है कि उनके द्वारा (गीता में) बताये हुए ढंगों से ही मानव जीवन सफल हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा है कि उन ढंगों के अतिरिक्त जीवन को सफल करने का कोई दूसरा उपाय है ही नहीं। (11.20.6)

इसे दूसरे ढंग से समझें- किसी भी भौतिक चीज का निर्माण बाद में होता हैं, पहले उसका उद्देश्य निर्धारित होता है उदाहरणार्थ पेन का निर्माण बाद में हुआ, पहले उसका उद्देश्य बना यथा शब्दों को लिपिबद्ध करना। फ्रिज का उद्देश्य पहले निर्धारित हुआ, बाद में फ्रिज का निर्माण हुआ। यही बात लागू होती है टी.वी. पर, बर्तनों पर, मोटर साईकिल पर, कार पर, कपड़े धोने की मशीन पर, कपड़ों पर या अन्य किसी भी चीज पर।

इसके अतिरिक्त उन सब चीजों को उपयोग करने की एक निर्देशित विधि होती है जिससे हम उस चीज से उसका उद्देश्य प्राप्त कर सकें। उदाहरण के लिये माइक्रोवेव ओवन का उद्देश्य होता है उसमें रखकर चीजों को बहुत कम समय में गर्म कर लें। उसके उपयोग विधि में यह निर्देशित है कि गर्म करने वाले पदार्थों को काॅंच के अथवा मेलमोवेयर आदि पात्रों में रखकर ही गर्म करें। परन्तु यदि कोई कहता है कि मेरा मन तो उन पदार्थों को स्टील के बर्तन में रखकर गर्म करने को करता है और वह उसका उपयोग वैसे ही करता है तो क्या होगा? निश्चित रूप से माइक्रोवेव ओवन के उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होगी और माइक्रोवेव भी खराब हो सकता है। ऐसे ही यदि कोई फ्रिज को बजाय उसमें पदार्थों को रखकर ठंडा करने के लिये उपयोग में लाये, उसका उपयोग अपने शरीर को ठंडा करने के लिये करता है तो, निर्माता उसे ऐसा करने से रोक नहीं सकता है। परन्तु यदि वह फ्रिज का दरवाजा खोलकर कुर्सी लेकर सामने बैठता है (अपने शरीर को ठंडा करने के लिये) तो शायद फ्रिज जल्दी ही खराब हो जायेगा, उसकी बिजली की खपत भी बहुत बढ़ जायेगी और उसके निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति तो होगी ही नहीं। यही बात कपड़ों के लिये भी कही जा सकती है यथा कुर्ते को पैयजामें की जगह और पैयजामें को कुर्ते जगह पहनने से स्थिति क्या होगी हम समझ सकते है। यही बात हर भौतिक चीज के लिये कहीं जा सकती है।

यह निर्देशित विधि किसके द्वारा और कहाँ दी जाती है? यह विधि उस चीज का निर्माता देता है और देता है निर्देशक पुस्तिका (User Manual) में। सार रूप से

  1. किसी भी चीज का उद्देश्य पहले निर्धारित होता है, बाद में उसका निर्माण होता है और
  2. उसके सही उपयोग करने की विधि दी जाती है निर्माता के द्वारा जारी किये गये User Manual में। उसमें दी गयी विधि से ही उसका उपयोग करने से हम उस वस्तु के उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं। अगर गलत ढंग से उपयोग करेंगे तो शायद अपना बहुत नुकसान कर सकते हैं।

अब विचार करें अत्यन्त बहुमूल्य मनुष्य शरीर के बारे में। किसने बनाया है यह मनुष्य शरीर- निश्चित ही भगवान ने। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से इसे कहा है –

‘‘अवश्य ही इस शरीर का उद्देश्य पहले बनता है और बाद में निर्माण होता है। हमारा काम केवल उस उद्देश्य को पहचानना है और उसको स्वीकार करना है।’’

अब क्योंकि भगवान हैं इस शरीर के निर्माता, अतः इसके सही ढंग से उपयोग करने की विधि वे ही बता सकते हैं, कोई दूसरा नहीं। अब यदि हम उस बताई हुई विधि से इसका उपयोग करेंगे तब तो इसके उद्देश्य को (जीवन के उद्देश्य को) प्राप्त कर लेंगे अन्यथा नही। इस शरीर का User Manual कौनसा है – निश्चित ही श्रीमद्भगवद्गीता। अतः बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम समझें कि –

  1. मानव जीवन का उद्देश्य बनाना हमारा काम नहीं, अपितु इसके निर्धारित उद्देश्य को पहचानना है और उसे स्वीकार करना है।
  2. मानव शरीर (जीवन) का उपयोग भगवान के द्वारा बताई हुई विधि (User Manual श्रीमद्भगवद्गीता) के अनुसार करने से ही हम उस उद्देश्य को प्राप्त कर सकते है। अतः इस User Manual को समझना परम आवश्यक हो जाता है।