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भगवान प्रेम के भूखे हैं

हरे कृष्ण !!

उपनिषदों में आता है कि ‘एकाकी न रमते।’ इसका सीधी-सादी भाषा में अर्थ होता है कि भगवान् का अकेले में मन नहीं लगा; इसलिये उन्होंने सृष्टि की रचना की।

‘मैं एक ही बहुत रूपों में हो जाऊँ’-ऐसे संकल्प से भगवान् ने मनुष्यों का निर्माण केवल अपने लिये किया है। संसार की रचना चाहे मनुष्य के लिये की हो, पर मनुष्य की रचना केवल अपने लिये की है।

इसका क्या पता?

भगवान् ने मनुष्य को ऐसी योग्यता दी है, जिससे वह तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके मुक्त हो सकता है; भक्त हो सकता है; संसार की सेवा भी कर सकता है और भगवान् की सेवा भी कर सकता है। यह संसार की आवष्यकता की पूर्ति भी कर सके और भगवान् की भूख भी मिटा सके, भगवान् को भी निहाल कर सके-ऐसी सामर्थ्य भगवान् ने मनुष्य को दी है! और किसी को भी ऐसी योग्यता नहीं दी, देवताओं को भी नहीं दी।

भगवान् को भूख किस बात की है?

भगवान् को प्रेम की भूख है।

प्रेम भगवान् को प्रिय लगता है। प्रेम एक ऐसी विलक्षण चीज है, जिसकी आवष्यकता सबको रहती है।

क्या आप जानना चाहते हैं की भगवद्गीता को समझने से कैसे आपका जीवन बदल सकता है ?

एक आसक्ति होती है और एक प्रेम होता है। किसी से जब हम अपने लिये स्नेह करते हैं, वह ‘आसक्ति’ होती है, राग होता है। राग से ही कामना, इच्छा, वासना होती है, जो पतन करने वाली, नरकों में ले जाने वाली है।

जिसमें दूसरों को सुख देने का भाव होता है, वह ‘प्रेम’ होता है।

 

आसक्ति में लेना होता है और प्रेम में दूसरों को देना होता है। दूसरों को सुख देने की ताकत मनुष्य में है।

भगवान् ने मनुष्य को इतनी ताकत दी है कि वह दुनियामात्र का हित कर सकता है और अपना कल्याण कर सकता है। इतना ही नहीं, मनुष्य भगवान् की आवष्यकता की पूर्ति भी कर सकता है, भगवान् के माँ-बाप भी बन सकता है, भगवान् का गुरू भी बन सकता है, भगवान् का मित्र भी बन सकता है और भगवान् का इष्ट भी बन सकता है!

जैसे लड़का अलग हो जाय तो माँ-बाप चाहते हैं कि वह हमारे पास आ जाय, ऐसे ही यह जीव भगवान् से अलग हो गया है, इसलिये भगवान् को भूख है कि यह मेरी तरफ आ जाय!

इस भूख की पूर्ति मनुष्य ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं। मनुष्य ही भगवान् से प्रेम कर सकता है। इतना ऊँचा अधिकार प्राप्त करके भी मनुष्य दुःख पाता है तो बड़े भारी आष्चर्य की बात है! मैं कितना ऊँचा बन सकता हूँ, यहाँ तक कि भगवान् का भी मुकुटमणि बन सकता हूँ! आप कृपा करके ध्यान दो कि कितनी विलक्षण बात है!

जितने भक्त हुए हैं मनुष्यों में ही हुए हैं और इतने ऊँचे दर्जे के हुए हैं कि भगवान् भी उनका आदर करते हैं! लोग संसार के आदर को ही बड़ा समझते हैं, पर भक्तों का आदर भगवान भी करते हैं, कितनी विलक्षण बात है।

सारथि बन जायॅं भगवान्!

नौकर बन जायँ भगवान्!

जूठन उठायें भगवान्!

घर का काम-धंधा करें भगवान्!

जिस तरह से माता अपने बच्चे का पालन करके प्रसन्न होती है, इसी तरह से भगवान् भी अपने भक्त का काम करके प्रसन्न होते हैं।

भगवान् का भक्तों के प्रति एक वात्सल्य भाव रहता है।

 

जैसे, चारे में गोमूत्र या गोबर की गंध भी आ जाय तो गाय वह चारा नहीं चरती। परन्तु अपने नवजात बछड़े को जीभ से चाटकर साफ कर देती है। वास्तव में वह बछड़े को साफ करने के लिये ही नहीं चाटती, इसमें उसे खुद को एक आनन्द आता है। उसके आनन्द की पहचान यह है कि अगर आप बछड़े को धोकर साफ कर दोगे तो गाय का दूध कम होगा और अगर गाय बछड़े को चाटकर साफ करे तो उसका दूध ज्यादा होगा। गाय की जीभ इतनी कड़ी होती है कि चाटते-चाटते बछड़े की चमड़ी से खून आ जाता है, फिर भी गाय छोड़ती नहीं; क्योंकि उसको एक आनन्द आता है। वात्सल्य प्रेम में गाय सब कुछ भूल जाती है। ‘वत्स’ नाम बछड़े का है और बछड़े से होने वाला प्रेम ‘वात्सल्य प्रेम’ कहलाता है।

भगवान् को भक्त का काम करनें में आनन्द आता है, प्रसन्नता होती है।

मनुष्य भगवान् की इच्छा की पूर्ति कर सकता है, इतनी इसमें योग्यता है! परन्तु यह दर-दर भटकता फिरता है-तुच्छ टुकड़ों के लिये, पैसों के लिये, भोगों के लिये! राम-राम-राम! किधर चला गया तू! भगवान् को आनन्द देने वाला होकर अपने सुख के लिये भटकता है और लालायित होता है!

भगवान् भक्त का काम करने के लिये अपयश सह लेते हैं, तिरस्कार सह लेते हैं, अपमान सह लेते हैं!

भगवान् ने भक्त को बहुत ऊँचा दर्जा दिया हैं। ‘मैं तो हूँ भगतन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि।’

नौ लाख गायें नंदजी के यहाँ दुही जाती थीं, पर गोपियों पर भगवान् का इतना प्रेम था कि वे कहतीं-‘लाला, तुम नाचो तो तुम्हें छाछ देंगी’, तो वे छाछ के लिये नाचने लग जाते!

हृदय का प्रेम भगवान् को बहुत मीठा लगता है। भगवान् से कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं, केवल भगवान् प्यारे लगें, मीठे लगें-यह भक्तों का भाव होता है।

यह तो प्रेम है, वह दोनों को भाता है अर्थात् भक्त भगवान् से आनन्दित होते हैं और भगवान् भक्त से। भगवान् और भक्त आपस में एक-दूसरें को देखकर आनन्दित होते रहते हैं। इतनी योग्यता रहते हुए भी मनुष्य दरिद्री हो रहा है, अभावग्रस्त हो रहा है, यह बड़े भारी आश्चर्य की बात है!

होश में नहीं आता कि मैं किस दर्जे का हूँ और क्या कर रहा हूँ?

तुच्छ चीजों के पीछे पड़कर यह अपना कितना नुकसान कर रहा है! झूठ, कपट, बेईमानी आदि करके महान नरकों में जाने की तैयारी कर रहा है। जिसमें यह भगवान् की प्राप्ति कर सकता है, उस अमूल्य समय को बर्बाद कर रहा है। हद हो गयी!

अब भी लग जाओ भगवान् में! संसार के काम को अपना काम न समझकर भगवान् का समझ लो, इतने से ही भगवान प्रसन्न हो जायँगे।

हरे कृष्ण !! 

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