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जीवन जीने की कला

हरे कृष्ण !!

भगवद्गीता व्यवहार क्षेत्र में जीवन जीने की कला सिखाती है। वह बताती है कि हम कैसे अपने जीवन को गीता के आधार पर जीयें। हम जीवन में व्यवहार कैसे करें तथा अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में कैसे कार्य करें कि हम चिंता शोक तनाव भय व अन्य विकारों से निजात पा सकें।

इसके लिए सर्वप्रथम तो हम यह समझें कि हम कौन हैं, हमारा परिचय क्या है? हम मोहन, सोहन, दिनेश, रमेश आदि नामों से अपना परिचय देते हैं। यह हमारा वास्तविक परिचय नहीं है। तो क्या मैं पंजाबी, बंगाली, राजस्थानी या कलेक्टर, कमिश्नर, जज, डॉक्टर हूँ? यह सब शरीर के नाम सम्बोधन , भाषा या पद इत्यादि को लेकर हैं। 

अच्छा तो मैं ब्रह्मचारी, ग्रहस्थ, सन्यासी आदि हूँ। यह भी आश्रम व्यवस्था को लेकर हैं। अच्छा तो मैं स्त्री, पुरुष मनुष्य आदि हूं। यह भी विभिन्न योनियों में जन्म मिलने से संबंधित है; तो फिर मैं शरीर हूँ, जिसमें चेतना है  परिवार का एक सदस्य हूँ।

खाने-पीने, घूमने, मौज-शौक करना, खूब धन दौलत कमाना, प्रसिद्धि पाना, जायदाद इत्यादि बनाना, शादी विवाह कर परिवार बढ़ाना और फिर अंत में मर जाना यही सब कुछ शायद हम हैं।

इसके अतिरिक्त हम नहीं जानते हम कौन हैं, कहां से कैसे आए और आगे कहाँ जाना है, हम नहीं जानते कि हमारा इस शरीर को पाकर क्या कर्तव्य है? अनुकूल परिस्थिति आने पर सुखी होते हैं और प्रतिकूल परिस्थिति आने पर शरीर- परिवार जिनमें मोह ममता होती है उसको लेकर दुखी होते हैं।

क्या आप जानना चाहते हैं की भगवद्गीता को समझने से कैसे आपका जीवन बदल सकता है ?

महाभारत के अर्जुन के सामने भी यही समस्या आयी । वे कौटुंबिक मोह के कारण अन्याय का साथ देने वाले दुर्योधन व कौरव पक्ष में (अन्याय के पक्ष में) उपस्थित गुरुजन पितामह, मामाओं, भाइयों व अन्य महारथियों, आचार्यों आदि को देख युद्ध का विचार त्याग कर अनेक प्रकार की दलीलें देने लगे, जो साधारण व्यक्ति को प्रथम दृष्टया उचित प्रतीत होती हैं।

बिना भगवान की बातें समझे हम सही मार्ग को जान ही नहीं पाएंगे। हम भी अर्जुन की ही तरह शरीरी को मरणधर्मा समझते हैं। मनुष्य को शोक तब होता है जब वह संसार के पदार्थ- प्राणी में दो विभाग कर लेता है। जिनको मेरा मानता है उनमें ममता, कामना, प्रियता आसक्ति हो जाती है।

गीता का उपदेश शरीर और शरीरी को लेकर आरंभ होता है। जब तक हम अपने आप को देह मानते रहेंगे चाहे कितना भी उपदेश सुन लें या सुनाते रहें, विभिन्न साधनाएं भी करते रहें, कोई लाभ नहीं होगा। 

श्री कृष्ण बताते हैं कि शरीर जड़ है, नाशवान है, परिवर्तनशील है और आदि अंत वाला है और इसमें चेतन तत्व शरीरी/देही अविनाशी है, अनादि है, नित्य है; अतः इसको कारणों से जाना नहीं जा सकता। यह शरीरी न कभी जन्मता है न मरता है यह नित्य निरंतर रहने वाला व शाश्वत है।

शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता (गीता 2.20)। शरीर असत् है और शरीरी सत् है। सत् सदा विद्यमान रहता है और असत् की सत्ता नहीं है (गीता 2.16)। 

कई तरह के दृष्टांत देकर श्री कृष्ण शरीर शरीरी के भेद को समझाते हैं। कर्तव्य कर्म की मर्यादा को निभाने के लिए धर्ममय युद्ध से बढ़कर क्षत्रिय के लिए दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है अर्थात हमारी दृष्टि कर्तव्य कर्म पर होनी चाहिए, स्वधर्म के पालन पर होनी चाहिए। हम जीवन में प्रायः पाप पुण्य का ठीक निर्णय नहीं कर पाते; अर्जुन को भी युद्ध करने में पाप का भय लग रहा था।

श्री कृष्ण इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जय-पराजय, लाभ-हानि, सुख-दुख को समान करके युद्ध करने से वह पाप को प्राप्त नहीं होगा (गीता 2.38) अर्थात निष्काम भाव पूर्वक सिद्धि-आसिद्धि में सम रह कर कर्तव्य कर्म करना ही गीता के अनुसार व्यवहार करना है।

इस समबुद्धि ऐसा धर्म के आरंभ का कभी नाश नहीं होता और इसके अनुष्ठान का उल्टा फल भी नहीं होता। इस समबुद्धि से युक्त हुआ तू कर्म बंधन से भी मुक्त रहेगा (गीता-2.40)। परंतु इस प्रकार की समबुद्धि के विषय में एक निश्चय वाली बुद्धि की आवश्यकता होती है। 

एक निश्चय नहीं होने से मनुष्य की बुद्धि अनन्त शाखाओं वाली हो जाती है। संसार सदा परिवर्तनशील है और परमात्मा एक रूप व अपरिवर्तनशील हैं, जिनके अंश हम स्वयं हैं, जिसे शरीरी कहा है। यह समबुद्धि ही अंतः करण की समता का साधन है। ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाने पर स्वरूप का बोध हो जाता है। यह (बोध) एक निश्चय वाली बुद्धि में ही होता है ( गीता 2.41)।

लेकिन संसार के पदार्थ, धन आदि प्राप्त करने का उद्देश्य रहने पर एक निश्चयात्मक बुद्धि नहीं हो सकती फिर बुद्धि की अनंत शाखाएं हो जाती हैं। अनन्त शाखाएं हो जाने से मनुष्य कामनाओं में तन्मय हो जाते हैं, स्वर्ग इत्यादि की प्राप्ति को श्रेष्ठ समझने लगते हैं।

वेदों में स्वर्ग के भोगों का वर्णन विस्तार से कहा गया है। अतः मनुष्य उनके (वेदों के) प्रभाव में आने पर स्वर्ग के अनेक भोगों की और खिंच जाता है, लेकिन वेद- शास्त्रों को तत्व से जानने वाले ब्रह्म ज्ञानियों का (वास्तविक तत्व जानने के कारण) उनमें कोई प्रयोजन नहीं रहता (गीता 2.46)।

अतः भगवान कर्तव्य कर्म करने में ही हमारा अधिकार बताते हैं, उनके फलों में नहीं। हम कर्मफल के हेतु भी ना बने और कर्मों को करने में भी हमारी आसक्ति ना हो। कर्मफल को प्राप्त करने में हम स्वतंत्र नहीं हैं। कहने का तातपर्य यह है कि एक करने का विभाग है और एक होने का। 

मनुष्य केवल कर्तव्य कर्म करने में ही स्वतंत्र है; अपने अनुसार फल की प्राप्ति में नहीं। यह कर्म करने का प्रमुख सूत्र है (गीता 2.47)। 

अतः आसक्ति और ममता का त्याग करके तथा सिद्धि-असिद्धि में सम रहकर   प्राप्त कर्तव्य कर्मों को करना चाहिए। गीता में समत्व को ही योग कहा है (गीता-2.48)। मनुष्य में और कोई लक्षण आए या नहीं आए पर समता जीवन में आ जाए तो गीता उसे सिद्ध कह देती है। 

सकाम कर्म अत्यंत निकृष्ट हैं और जन्म-मृत्यु को देने वाले हैं तथा समतायुक्त मनुष्य जीवित अवस्था में ही पाप और पुण्य को त्याग देता है (गीता- 2.50) । कर्मों की सिद्धि असिद्धि में और उनके फलों की  प्राप्ति में सम रहना ही कर्मों में कुशलता है । कर्म कितने भी बढ़िया क्यों न हो उनका संयोग वियोग होता ही है। अतः महत्व योग का है कर्मों का नहीं। गीता 2.50 में योग: कर्मसु कौशलम् के अर्थ में कर्मों में योग को ही कुशलता कहा है।

हरे कृष्ण !!

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