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संकीर्तन की महिमा

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हरे कृष्ण !!

नामसंकीर्तन यस्य सर्वपापप्रणाषनम्।

प्रणामो दुःखषमनस्तं नमामि हरि परम्।।

– भागवद् 12.13.23

‘जिनके नामका संकीर्तन सम्पूर्ण पापों का नाष करने वाला है और जिनको किया गया प्रणाम सम्पूर्ण दुःखों को शान्त कर देता है, उन परमतत्व-स्वरूप श्री हरि को मैं नमस्कार करता हूँ।’

 

इस कलियुग में भगवन्नाम की सबसे अधिक महिमा है। यद्यपि नाम की महिमा सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि-इन चारों ही युगों में है, तथा कलियुग में तो मनुष्यों के लिये भगवन्नाम ही मुख्य आधार है, आश्रय है तथा भगवन्नाम ही कल्याण का सुगम और सर्वोपरि साधन है।

क्या आप जानना चाहते हैं की भगवद्गीता को समझने से कैसे आपका जीवन बदल सकता है ?

भगवन्नाम का एक मानसिक जप होता है, एक उपांषु जप होता है, एक साधारण जप होता है और एक संकीर्तन होता है।

मानसिक जप वह होता है, जिसमें मन से ही नाम का जप-चिन्तन हो तथा जिसमें कण्ठ, जिहृा और होठ न हिले।

उपांषु जप वह होता है, जिसमें मुख बंद रखते हुए कण्ठ और जिहृा से जप किया जाय तथा जो अपने कानों को भी सुनायी न दे।

साधारण जप वह होता है, जिसमें अपने कानों को भी नाम सुनायी दे और दूसरों को भी सुनायी दे।

संकीर्तन वह होता है, जिसमें राग-रागिनियों के साथ उच्च स्वर से नामका गान किया जाय। भगवान् के नामके सिवाय उनकी लीला, गुण, प्रभाव आदि का भी कीर्तन होता है, परन्तु इन सबमें नाम-संकीर्तन बहुत सुगम और श्रेष्ठ है।
नाम-संकीर्तन में ताल-स्वर सहित राग-रागिनियों के साथ जितना ही तल्लीन होकर ऊँचे स्वर में नामका गान किया जाय, उतना ही वह अधिक श्रेष्ठ होता है।

नाम-संकीर्तन मस्त होकर, भगवान् में मन लगाकर किया जाना चाहिये। मन लगाने का अभिप्राय है कि दूसरे लोग मुझे देख रहे हैं या नहीं, दूसरे लोग कीर्तन कर रहे हैं या नहीं, मेरे कीर्तन का लोगों पर क्या असर पड़ रहा है-ऐसा मनमें भाव बिलकुल न रहे। ऐसा भाव वास्तव में कल्याण करने में बड़ा बाधक है। संकीर्तन में दिखावटीपन आने से वह मान-बड़ाई आदि की लौकिक वासना में परिणत हो जाता है और उसका प्रभाव जीवन पर कम पड़ता है।

भगवान् में मन लगाकर, तल्लीन होकर नाम-संकीर्तन किया जाय तो उससे एक विलक्षण वायुमण्डल बनता है। वह वायुमण्डल सब जगह फैल जाता है, जिससे संसार मात्र का हित होता है।

शब्द व्यापक है-इस बात का तो रेडियो, वायरलेस आदि द्वारा आविष्कार हो चुका है, पर भाव व्यापक है-इस बात का आविष्कार अभी तक नहीं हुआ है। वास्तव में भाव शब्द से भी अधिक व्यापक है; क्योंकि भाव शब्द से भी अधिक सूक्ष्म है।

जो वस्तु जितनी सूक्ष्म होती है, वह उतनी ही अधिक व्यापक होती है। अतः संसार मात्र की सेवा करने में सेवा का भाव जितना समर्थ है, उतने पदार्थ समर्थ नहीं हैं। भावों में भी भगवद्भाव बहुत विलक्षण है; क्योंकि भगवद्भाव चिन्मय तत्व है। भगवान् के समान दूसरा कोई सर्वव्यापक तत्व नहीं है। अतः भगवद्भाव से भगवान् के नाम का संकीर्तन किया जाय तो उसका संसार-मात्र पर बहुत विलक्षण असर पड़ता है; वह संसार मात्र को शान्ति देने वाला होता है।

शब्द में अलौकिक शक्ति है। जब मनुष्य सोता है, तब उसकी इन्द्रियाँ मनमें, मन बुद्धि में और बुद्धि अविद्या में लीन हो जाती है, परन्तु जब सोये हुए मनुष्य का नाम लेकर पुकारा जाय, तब वह जग जाता है। ऐसे ही भगवन्नाम-संकीर्तन से जन्म-जन्मान्तर से अज्ञान-निद्रा में सोया हुआ मनुष्य भी जग जाता है। इतना ही नहीं, नाम-संकीर्तन के प्रभाव से सब जगह विराजमान भगवान् भी प्रकट हो जाते हैं। भगवान् ने कहा है-

‘नारद! न तो मैं वैकुण्ठ में निवास करता हूँ, और न योगियों के हृदय में ही, अपितु जहाँ मेरे भक्त मेरे नाम आदि का कीर्तन करते हैं, मैं वहीं रहता हूँ।’

 

नाम-संकीर्तन का प्रभाव वृक्ष, लता आदि स्थावर और मनुष्य, पषु, पक्षी आदि जंगल प्राणियों पर तो पड़ता ही है, निर्जीव पत्थर, काष्ठ, मिट्टी, मकान आदि पर भी उसका प्रभाव पड़ता है।

जहाँ नामजप, ध्यान, कथा, सत्संग आदि भगवत् संबंधी बातें हो रही हों अथवा पहले हुई हों; वहाँ जानें से शान्ति मिलती है, पापों का नाष होता है, पवित्रता आती है, जीवन पर स्वाभाविक एक विलक्षण प्रभाव पड़ता है; परन्तु इसकी अपेक्षा भी कीर्तन प्रेमी पर नाम-संकीर्तन का विषेष प्रभाव पड़ता है। नाम-संकीर्तन में संकीर्तन सुनने वाले और देखने वाले-दोनों पर ही संकीर्तन का प्रभाव पड़ता है। उसमें प्रत्यक्ष एक रस आता है, जिसका अनुभव कीर्तन करने वाले करते हैं।

बंगाल और महाराष्ट्र में संकीर्तन का विशेष प्रचार है। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु ने और महाराष्ट्र में संत तुकाराम आदि ने संकीर्तन का विशेष प्रचार किया।

वाद्य के साथ एक स्वर में सबके द्वारा मिलकर संकीर्तन किया जाय तो उससे एक विशेष शक्ति पैदा होती है-‘संघ शक्तिः कलौ युगे।’

संकीर्तन के समय अपनी आँखें मीच ले और ऐसा भाव रखे कि मैं अकेला हूँ और मेरे सामने केवल भगवान् खड़े हैं; दूसरों की जो आवाज आ रही है, वह भी भगवान् की ही आवाज है। इस प्रकार भगवद्भाव से संकीर्तन करने से बहुत लाभ होता है और कोई पाप, दुर्गुण-दुराचार नहीं रहता। परन्तु भगवान् का साक्षात् अनुभव तभी होता है, जब केवल शुद्ध कीर्तन हो।

महाराष्ट्र में समर्थ गुरू रामदास बाबा एक बहुत विचित्र संत हुए हैं

इनके संबंध में एक बात (कथा) प्रसिद्ध है। ये हनुमान् जी के भक्त थे और इनको हनुमान् जी के दर्शन हुआ करते थे। एक बार बाबा जी ने हनुमान् जी से कहा कि

‘महाराज! आप एक दिन सब लोगों को दर्शन दें।’

हनुमान् जी ने कहा कि ‘तुम लोगों को इकट्ठा करो तो मैं दर्शन दे दूँगा।’

बाबाजी बोले कि ‘लोगों को तो मैं हरिकथा से इकट्ठा कर लूँगा।’

हनुमान् जी ने कहा कि ‘शुद्ध हरिकथा करना।’ हरिकथा से लोग आते हैं, ‘शुद्ध हरिकथा से मैं आ जाऊँगा।’

बाबा जी बोले कि ‘शुद्ध हरिकथा ही करूँगा।’

संत तथा राजगुरू होने के कारण बाबाजी का ऐसा प्रभाव था कि वे जहाँ जाते, वहीं हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे हो जाते। उन्होंने एक शहर में जाकर कहा कि आज रात शहर के बाहर अमुक मैदान में हरिकथा होगी। समाचार सुनते ही हरिकथा की तैयारी प्रारम्भ हो गयी। प्रकाश की व्यवस्था की गयी, दरियाँ बिछायी गयीं। समय पर बहुत से लोग इकट्ठे हो गये। सब गाने-बजाने वाले आकर बैठ गये और कीर्तन प्रारम्भ हो गया। बीच-बीच में बाबाजी भगवान् की कथा कह देते और फिर कीर्तन करने लगते। ऐसा करते-करते वे केवल कीर्तन में ही मस्त हो गये। लोगों को यह आशा थी कि अब बाबाजी कथा सुनायेंगे, पर वे तो कीर्तन ही करते चले गये। लोगों के भीतर असली भाव तो था नहीं; अतः ‘यह कीर्तन तो हम घर पर ही कर लिया करते हैं; यहाँ कबतक बैठे रहेंगे!’ ऐसा कहकर वे धीरे-धीरे उठकर जाने लगे। धीरे-धीरे गाने-बजाने वाले भी खिसक गये। बाबाजी तो आँखें बंद करके अपनी मस्ती में कीर्तन करते ही रहे। क्योंकि वे हनुमान् जी की आज्ञा के अनुसार शुद्ध हरिकथा कर रहे थे। जब सब चले गये, तब हनुमान् जी प्रकट हो गये।

बाबाजी ने हनुमान् जी से कहा कि ‘महाराज! सबको दर्शन दें!’

हनुमान् जी बोले-‘सब हैं कहाँ?’ वहाँ और तो कोई था ही नहीं, केवल बाबाजी ही थे।

इस प्रकार भावपूर्वक केवल भगगन्नाम का संकीर्तन करना ‘शुद्ध हरिकथा’ है। इस शुद्ध हरिकथा से भगवान् साक्षात् प्रकट हो जाते हैं। वर्तमान में संकीर्तन की बड़ी आवष्यकता है। अतः जगह-जगह लोगों को एक साथ मिलकर अथवा अकेले संकीर्तन करना चाहिये। इससे संसार मात्र में शान्ति का विस्तार होगा।

हरे कृष्ण !! 

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