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कर्म योग की परिभाषा

हरे कृष्ण।

कर्म योग, गीता का पूरे विश्व को और मानव मात्र को दिया गया, वह अनुपम उपहार है जिससे प्राणी मात्र अपना और अपने परिवार देश समाज एवं विश्व का कल्याण कर सकता है।

कर्म योग वह गुप्त और रहस्यमयी विद्या है, जिस का विशद वर्णन भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद भगवत गीता में करते हैं।

कर्म योग का वर्णन, जैसा गीता में किया गया है, वैसा विश्व के अन्य किसी भी धर्म अथवा ग्रंथ में नहीं।

कर्म हर प्राणी मात्र को करना ही पड़ता है कर्म किए बिना कोई भी मनुष्य रह नहीं सकता। (३.५) 

ऐसा भी कह सकते हैं कि मनुष्य मात्र में कर्म करने का एक वेग होता है यह वेग पूर्व जन्म के कर्म संस्कारों के कारण हमारे स्वभाव में ही निहित होता है जब तक कर्म करने का वेग पूरी तरह शांत नहीं हो तब तक जीवन में निष्कामता का प्रवेश हो नहीं सकता। (३.४)

भगवान श्रीकृष्ण कर्मों को करने की ऐसी उत्तम शैली बताते हैं जिससे साधारण से साधारण कर्म, फिर वे चाहे हमारे घर परिवार के कामों से संबंधित हो, चाहे हमारी नौकरी और हमारे व्यापार से संबंधित हो, उन सभी कर्मों से हमारा भगवान से योग हो सकता है अर्थात जीते जी हम समता को प्राप्त हो सकते हैं, उस परम आनंद, उस परम शांति को प्राप्त हो सकते हैं, जिसको कि मनुष्य मात्र ही नहीं, पूरा विश्व खोजने का असफल प्रयास कर रहा है।

इसके लिए सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि मनुष्य जीवन परमात्मा का अनुपम उपहार है। यह ईश्वर की एक ऐसी विलक्षण कृति है जिसकी तुलना अन्य किसी भी योनि से हो नहीं सकती।

सब मम प्रिय सब मम उपजाए
सबसे अधिक मनुज मोहे भाये 

अर्थात मनुष्य जीवन को कमतर आंकना वस्तुतः अपना ही अपमान करना है। जब हम इस दुर्लभ मनुष्य जीवन से उस परमात्मा की प्राप्ति का, अर्थात समता की प्राप्ति का एक लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं, फिर हमारे कर्मो की मनसा वाचा कर्मणा एकसी स्थिति होने लगती है। जीवन से मिथ्याचार,ढोंग- बनावटपन गायब होने लगता है। यह बहुत आवश्यक है कि हमारा मन और मुख एक हो। (३.६)

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – अर्जुन ! तुम यदि यज्ञ के लिए कर्तव्य कर्म करोगे, यज्ञ अर्थात प्राणी मात्र के हित के लिए अथवा दूसरों के हित के लिए कर्म करना जिसमें खुद का स्वार्थ किंचित मात्र भी नहीं हो, तो तुम कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त ही हो। (३.९)

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं यज्ञ के लिए कर्म करने वाला व्यक्ति रात और दिन कर्म में लगा रहकर भी इस भवसागर से बड़ी आसानी से पार हो जाता है।

यह सृष्टि यज्ञ की वेदी ही है और मानो हमारा शरीर, क्रियाएँ सामग्री अथवा समिधा रूप ही है।

ईश्वर ने सृष्टि की रचना ही इस तरह से की है कि हम सबका जीवन एक दूसरे पर आश्रित है। यदि हम परस्पर साहचर्य भाव से रहे, अपने कर्तव्य पालन से दूसरे के अधिकार की रक्षा करें तो स्वयं के अधिकार की रक्षा स्वतः होती है, समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति भी प्रकृति अपने आप करती है। हमें जो भी वस्तु पदार्थ और सामर्थ्य मिला है, मानो इस सृष्टि रूपी यज्ञ में हवन करने के लिए, होम करने के लिए मिला है ,जिससे समस्त जगत का चहुमुंखी विकास होगा।

यदि हम सृष्टि – चक्र के इस रहस्य को समझ जाएं तो पूरे विश्व में सद्भाव प्रेम और शांति स्थापित हो जाए।

सृष्टि का कण कण एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, हर प्राणी के कर्म और भाव का असर एक दूसरे पर होता ही है, चाहे कम या ज्यादा।

जैसा हम सृष्टि को अथवा प्रकृति को देते हैं वैसा ही हमें कई गुना होकर मिलता है। क्योंकि परमात्मा कण कण में है, अतः इस सृष्टि चक्र को समझ कर दूसरों के कल्याण के लिए निरंतर कर्तव्य कर्म करते रहना ही मानवता है। (३.१९)

जो इस बात को नहीं समझता वह पापी है उसका जीवन व्यर्थ है। (३.१६)  

मनुष्य मात्र को कर्म योग का आचरण करते हुए जीवन जीना चाहिए ताकि और लोग भी उस से प्रेरणा ले सकें।

हम अपने आचरण से दूसरों के पतन का कारण नहीं बने भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं भी ताजिंदगी विभिन्न कर्तव्य कर्म में अथवा धर्म- पालन में रत रहते हैं क्योंकि लोग उन्हें देखकर वैसा ही आचरण करेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हम उस असीम शक्ति में विश्वास करते हुए निष्काम चित्त द्वारा, बिना किसी फल की आशा किए और चिंता किये, संपूर्ण कर्मों को करते जाए तो हम समस्त कर्म- बंधनों से छूट जाते हैं, कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण का हो भगवान श्री कृष्ण के इस मत का पालन कर सकता है।

इसके लिए हमें अपनी इंद्रियों में छिपे हुए राग और द्वेष के वश में नहीं होना चाहिए। (३.३४)

हमें भगवान श्रीकृष्ण के कहे अनुसार अपने धर्म का पालन करना चाहिए। (३.३५)

हमें भगवान ने किसी देश में, किसी जाति या वर्ण में अथवा किसी परिस्थिति में जन्म दिया है, यह हमारे कर्मों के अनुसार ही है । हम अपने माता-पिता को बदल नहीं सकते। हम जहां हैं, जैसे हैं वहीं से अपने स्वधर्म का पालन करते हुए भगवत- प्राप्ति कर सकते हैं क्योंकि कोई भी कार्य छोटा बड़ा नहीं होता।

किसी बड़े कर्म से परमात्म प्राप्ति होती हो ऐसी बात बिल्कुल नहीं है।

हर कर्म के पीछे जो हमारा भाव है ,निश्चय है, उद्देश्य है, उसी अनुसार कर्म की संज्ञा मानी जाती है, और तदनुसार ही फल मिलता है।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि, कामना समस्त पापों की जड़ है । (३.३७)

कामना यदि अपने शरीर और अपने सुख के लिए है तो पतन कारक है लेकिन यही कामना यदि परिवार देश और समाज के लिए है तो कल्याणकारी है और हमारी स्वयं की कामना को खत्म करने वाली है।

कामना को खत्म करने का सबसे सरल उपाय कर्म योग ही है अर्थात हम भगवान द्वारा प्रदत वस्तु सामग्री और अवसर से यथाशक्ति दूसरों की निष्काम भाव से सेवा करें तो हमें विशेष आनंद की अनुभूति होगी इसके अलावा कामना को खत्म करने का और कोई उपाय नहीं है।

शास्त्रों में राजा ययाति की कहानी आती है जो कि हजारों साल कामभोग करने के बाद भी अपनी कामना को शांत नहीं कर पाए, यहां तक कि उन्होंने अपने सबसे छोटे पुत्र से भी उसका यौवन ले लिया। उसके बाद भी उनकी कामना शांत नहीं हुई।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं , कि, अर्जुन ! कामना भोगों से शांत नहीं होती, अपितु बढ़ती है।

कामना को खत्म करने का एक ही उपाय कि —

    • हम अपने अंदर स्वयं में दृढ़ निश्चय करके और भगवान की बात पर विश्वास करके कर्म योग का आचरण करें।
    • हम जैसे ही दृढ़ निश्चय करते हैं, स्वयं की महत्ता को पहचानते हैं तो, हमारा मन बुद्धि और इंद्रियां तक निश्चय के अनुसार कार्य करने लगते हैं।
    • हम मन बुद्धि के राजा हैं उनके गुलाम नहीं, अपने इस स्वरूप की झलक पाते ही हम इस संपूर्ण शरीर और इंद्रियों का नियमन कर सकते हैं और मनुष्य जीवन के सर्वोच्च आनंद को प्राप्त कर सकते हैं।

हरे कृष्ण।

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