Bhagavad Gita 8.16

Bhagavad Gita 8.16: Verse 16

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।8.16।।

भावार्थ - Gist

हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं॥8.16॥

All worlds, from the abode of Brahma downwards, provide only a temporary home to man. But O son of Kunti! On attaining Me there is no rebirth.

व्याख्या - Explanation

1) ब्रह्मलोक तक अर्थात् ब्रह्मलोक और उससे नीचे के सभी लोकों में रहने वाले प्राणियों को उनके पुण्य समाप्त होने पर लौट कर आना पड़ता है।
2) मृत्यु लोक के सुख से सौ गुणा अधिक सुख देवलोक के देवताओं के हैं। इन देवलोक के देवताओं के सुख से सौ गुणा अधिक सुख आजान देवताओं को है। आजान देवता वे कहलाते हैं, जो कल्प के आदि में देवता बने हैं और कल्प के अन्त तक देवता बने रहते हैं। अजान देवता के सुख से सौ गुणा अधिक सुख इन्द्र का माना गया है। इन्द्र के सुख से सौ गुणा अधिक सुख ब्रह्मलोक का माना गया है। इस ब्रह्मलोक से भी अनन्त गुणा अधिक आनन्द कृष्ण के शुद्ध भक्त का होता है। भगवत्प्राप्ति का सुख कभी नष्ट नहीं होता है, सदा बना रहता है।
3) जीव कृष्ण का अंश है (15.7) और जहाँ जाकर उसे फिर लौटकर नहीं आना पड़ता, वह कृष्ण का धाम है। अब यदि वह कृष्ण का अंश है, तो वह सदैव ही कृष्ण के धाम को क्यों नहीं जाता है और लौटकर क्यों आ जाता है ?
क्योंकि जीव ने घर, परिवार, जमीन, धन आदि में ममता-आसक्ति पैदा कर ली है, जिसके कारण जीव को शरीर को छोड़ने के बाद पुनः लौट कर आना पड़ता है, चाहे वह मनुष्य बन कर आये या पशु- पक्षी बन कर आये, आना तो उसे पड़ता ही है।
4) ब्रह्मलोक में जाने वाले मनुष्य दो प्रकार के होते हैं –
(क) जो वहाँ के सुख भोगने का उद्देष्य रखकर यहाँं पुण्य कर्म करते हैं और फिर वहाँ जाकर असीम सुख का भोग करते हैं।
(ख) वे जो कृष्णप्राप्ति के लिये साधन में लगे हुए हैं, परन्तु किसी समय (अन्तकाल में) किसी कारण विशेष से साधन से विचलित हो गये, तो ब्रह्मलोक में जाते हैं। वहाँ से ब्रह्माजी के साथ मुक्त हो जाते हैं, जिसे ‘क्रम मुक्ति’ कहते हैं।

(1)     All the worlds from the abode of Brahma downwards are subject to reversion, i.e. all people living in them have to return to earth after their virtuous actions are exhausted.

(2)     The lowest of the abodes of gods provide a hundred times more happiness than this mortal world. Ajana devata (Permanent gods) are those who at the beginning of the universe were gods and continue to be gods till the end of the  universe. They are a hundred times happier than the mortal gods whose spheres were referred to above. Indra, the ruler of the gods, is regarded as hundred times happier than permanent gods. The abode of Brahma is supposed to contain a hundred times more joys than that of Indra; but the bliss of the pure devotee is infinitely greater even than that of the abode of Brahma. The bliss of a soul who has attained God never perishes, it is permanent.

(3)     The soul is a fragment of Krishna (15.7) and Krishna’s abode is that ultimate sphere from where the soul never has to return to this mortal world. Now if man’s soul is Krishna’s part why does he have to return to earth after death?

He returns to earth after death because he has developed attachment to house, family, land, wealth etc which are the components of the mortal world. Hence he has to return to it after leaving the present body either in a human form or in the body of an animal or a bird but return he must, this is certain.

(4)     Two kinds of persons are able to enter the abode of Brahma-

(i) Those who perform pious activities here in this world with the objective of enjoying the pleasures of the abode of Brahma. They experience unlimited pleasures there .

(ii)Some of those who were striving to attain Krishna but at some stage went astray from their spiritual discipline, also go to the abode of Brahma. They get liberated with Brahma, at the time of the final annihilation. This liberation is called gradual salvation (Kram mukti).