Bhagavad Gita 3.21

Bhagavad Gita 3.21: Verse 21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।

भावार्थ - Gist

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)॥3.21॥

Whatever actions great men perform other men follow .Whatever examples are set by them, the world acts accordinngly.

व्याख्या - Explanation

मनुष्य श्रेष्ठ दो प्रकार से माना जाता है- स्वयं या समाज की दृष्टि से अथवा शास्त्रों की दृष्टि से।
1. प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जिस समाज, सम्प्रदाय आदि में जो श्रेष्ठ पुरुष कहलाते हैं, वे जैसा आचरण करते हैं, उस समाज, सम्प्रदाय के अन्य लोग भी वैसा ही आचरण करने लग जाते हैं।

2. अन्तःकरण में धन और पद का महत्त्व एवं लोभ रहने के कारण लोग करोड़पतियों एवं नेताओं को श्रेष्ठ मान लेते हैं और उन्हें बहुत आदर के साथ देखते हैं। जिनके अन्तःकरण में जड़ वस्तुओं (धन, पद आदि) का महत्त्व है वे न स्वयं श्रेष्ठ होते हैं और न श्रेष्ठ व्यक्तियों को समझ सकते हैं। श्रेष्ठ समझे जाने वाले पुरुषों के आचरण का स्वतः प्रचार हो जाता है जिसके कारण वर्तमान में झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी आदि का किसी पाठषाला में पढ़ाये बिना ही स्वतः प्रचार होता चला जा रहा है।

3. यह वास्तव में दुःख की बात है कि लोग भगवान् का नाम लेने वाले को श्रेष्ठ न समझकर करोड़पति को श्रेष्ठ समझते हैं। करोड़पति मरने पर एक भी कौड़ी साथ नहीं ले जायेगा, जबकि भगवान् का जाप करने वाला मरने पर पूरा का पूरा भगवन्नाम का धन साथ ले जायेगा। एक भी नाम पीछे नहीं रहेगा।

1.         A man is considered great in two respects –

i.          according to society or self and

ii.         From the view point of scriptures. Generally, people follow those who      are considered great in their society, community etc.

2. Importance and greed of wealth and position cause people to consider millionaires to be great personalities and they are treated with a lot of respect. Men who consider material things (wealth, position, etc,.) of prime importance are neither great themselves nor are they capable of recognizing true greatness in others. The conduct of so- called great people gets propagated effortlessly; that is why lies, dishonesty, cheating, theft and other evils are rampant in today’s world without being taught in any classroom.

3.It is pity that people, instead of treating a person, chanting Krishna’s sacred name as a great personality consider a millionaire to be great. No one stops to think that the Millionaire             would be leaving behind every bit of his possessions on death wheareas the person, chanting Krishna’s name, would take with him every bit of the spiritual wealth he has earned through chanting Krishna’s name. Not a single name chanted would be left behind.

4.The one whose inner consciousness is devoid of desires, attachment and feeling of ownership and who wants nothing out of destructible things cause great impact on people by whatever they say.