Bhagavad Gita 5.5: Verse 5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5.5।।
भावार्थ - Gist
ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है॥5.5॥
The truth that can be learnt from Sakhyayoga can also be attained through Karmayoga. Hence he who sees Sankhyayoga and Karmayoga as one (from the angle of results) sees correctly.

व्याख्या - Explanation
(1) सांख्ययोगी और कर्मयोगी दोनों का ही अन्त में कर्मों से अर्थात् क्रियाशील प्रकृति से सम्बन्ध विच्छेद होता है। तभी तो दोनों योग को एक ही कहा है।
(2) पाने की इच्छा उसमें होती है, जिसमें अभाव होता है। स्वरूप में अभाव हो नहीं सकता, इसलिये पाने की इच्छा हो नहीं सकती। पाने की इच्छा न होने से उसमें कभी करने का राग उत्पन्न नहीं होता। किन्तु जीव जब अपने को अभावग्रस्त शरीर मान लेता है, तब उसमें अभाव प्रतीत होने लगता है, जिससे उसमें पाने की इच्छा उत्पन्न होती है, जिससे करने का राग उत्पन्न हो जाता है। पाने की इच्छा और करने का राग-ये दोनों कर्मयोग से मिट जाते हैं।