Bhagavad Gita 7.3: Verse 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्िचद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्िचन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।7.3।।
भावार्थ - Gist
हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है॥7.3॥
Out of thousands among men, hardly one strives to attain spiritual perfection, and out of those liberated spirits who attain salvation, scarcely one exceptional striver knows Me in reality.

व्याख्या - Explanation
(1) धन, मान, बड़ाई, भोग पदार्थ आदि नाशवान् वस्तुओं के संस्कार रहने से, उन विषयों का संग होने पर, उन विषयों में रुचि होने पर भी जो अपने विचार और उद्देश्य में विचलित नहीं होता- ऐेसा कोई एक पुरुष ही सिद्धि के लिये प्रयत्न करता है। भगवत्प्राप्ति के लिये प्रयत्न करना ही सिद्धि के लिये प्रयत्न करना है।
(2) वास्तव में भगवत्प्राप्ति दुर्लभ या कठिन नहीं है, प्रत्युत सच्ची लगन से तत्परतापूर्वक लगने वाले बहुत कम हैं।
(3) भगवान् को यथार्थ रूप से जानने वाला उनके सगुण, निर्गुण, निराकार, साकार, समय-समय पर तरह-तरह के अवतार लेने वाले रुपों को तत्त्व से जानता है और उनके बारे में किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। केवल निर्गुण को जानने वाला कृष्ण को तत्त्व से नहीं जानता, प्रत्युत सगुण, निर्गुण दोनों को (समग्र को) जानने वाला ही भगवान् को तत्त्व से जानता है।
(4) ज्ञानयोग से ‘अखण्ड आनन्द’ (दुःखों के अभाव की अवस्था) का अनुभव होता है, क्योंकि वह अपने स्वरूप में स्थित होता है। कर्मयोग में संसार से सम्बन्ध विच्छेद होने से शान्त आनन्द की प्राप्ति होती है, क्योंकि संसार के साथ सम्बन्ध होने से अशान्ति ही होती है। किन्तु जिसमें भक्ति के संस्कार हैं और जिस पर कृष्ण की कृपा है, उसको अखण्ड आनन्द या शान्त आनन्द में संतोष नहीं होता। उसके अंदर ‘अनन्त आनन्द’ की भूख रहती है। भक्तियोग से उसी अनन्त आनन्द की प्राप्ति होती है।