Bhagavad Gita 8.14: Verse 14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।
भावार्थ - Gist
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥8.14॥
O son of Pratha (Arjuna)! The man whose mind is undividedly absorbed in Me, who ceaselessly remembers Me and is perpetually involved in Me, to that yogi I am easily attainable.

व्याख्या - Explanation
1) जिसके चित्त में भोगों और ऐश्वर्यों का किंचिन्मात्र भी चिन्तन नहीं है, जिसके अन्तःकरण में कृष्ण के सिवाय अन्य किसी का कोई आश्रय नहीं है, महत्त्व नहीं है वह अनन्य चित्तवाला है।
2) सततम् का अर्थ है- निरन्तर (अर्थात् जब से नींद खुले, तबसे लेकर गाढी नींद आने तक) जो मेरा स्मरण करता है। नित्य का अर्थ है- जिस दिन से इस बात को पकड़ा, उस दिन से लेकर मृत्यु तक जो मेरा स्मरण करता है।
3) जैसे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपन को याद करे या न करे, उसके ब्राह्मणपन में कोई फर्क नहीं पड़ता, ऐसे ही ‘मैं कृष्ण का हूँ और कृष्ण मेरे हैं’- इस नित्य सम्बन्ध में दृढ़ रहने वाला ही नित्ययुक्त है।
परन्तु भूल से मनुष्य अपने को कृष्ण से और कृष्ण को अपने से अलग मान लेता है, इसके बजाय वह अपने को शरीर का और शरीर को अपना मान लेता है। इससे वह भवबन्धन में फँस जाता है। जब यह विपरीत धारणा सर्वथा मिट जाती है, तब भगवान् स्वतः सुलभ हो जाते हैं।
4) आठवें से तेरहवें श्लोक तक निराकार का स्मरण बताया है, उसमें प्राणायाम की मुख्यता है, जिसेे सिद्ध करना (दक्षता प्राप्त करके नियमित रूप से प्रयोग में लाना) कठिन है। परन्तु भगवान् के स्मरण में ऐसी कठिनता नहीं है। कृष्ण के साथ साधक का नित्य सम्बन्ध है। यदि इसे मान कर वह शरीर, मन, बुद्धि सहित अपने आपको कृष्ण के समर्पित कर दे, तो साधक को मृत्यु के बाद अपनी गति के विषय में जरा भी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। यह साधन क्रियाजन्य या अभ्यासजन्य नहीं है, यह तो स्वाभाविक सम्बन्ध की जाग्रति है, अतः इसमें कठिनता का नामोनिशान भी नहीं है। इसीलिये कृष्ण ने अपने-आपको सुलभ बताया है।