Bhagavad Gita 12.10: Verse 10
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10।।
भावार्थ - Gist
यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम ‘भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना’ है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा॥10॥
If you find yourself unable even to practice as mentioned above, become intent on performing ordained actions for Me; and thus doing selfless actions for My sake, you will attain perfection.

व्याख्या - Explanation
(1) कृष्ण के लिये कर्म करने के परायण होने का तात्पर्य है कि सम्पूर्ण कर्मों (वर्णाश्रम धर्मानुसार शरीर निर्वाह और आजीविका सम्बन्धी एवं भजन, कीर्तन, ध्यान, नाम जप आदि) का उद्देश्य कृष्ण प्राप्ति ही होना चाहिये।
(2) धन प्राप्ति के लिये व्यापार करने वालों को ज्यों-ज्यों धन प्राप्त होता है, त्यों-त्यों ही उनके मन में धन का लोभ और कर्म करने का उत्साह बढ़ता है। ऐसे ही साधक जब सम्पूर्ण कर्म कृष्ण के लिये ही करता है, तब उसके मन में कृष्ण प्राप्ति की उत्कण्ठा और साधन करने का उत्साह बढ़ता रहता है। उत्कण्ठा तीव्र होने पर कृष्ण का वियोग असह्य हो जाता है, तब कृष्ण छिपे नहीं रहते।
(3) अपनी प्राप्ति के लिये कृष्ण इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि साधक अपनी पूरी योग्यता, सामर्थ्य आदि को मेरी प्राप्ति में लगा दे अर्थात् कुछ भी बचाकर न रखे।