Bhagavad Gita 12.15: Verse 15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।12.15।।
भावार्थ - Gist
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम ‘अमर्ष’ है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है॥15॥
He who never causes any living creature to be agitated, nor is himself agitated by anyone, who is free from joy and envy, fear and anxiety, is dear to Me.

व्याख्या - Explanation
(1) भक्त सबमें अपने परमप्रिय कृष्ण को ही देखता है, उसकी समस्त क्रियाएँ कृष्ण की प्रसन्नता के लिये ही होती हैं (6.31), फिर वह किसी भी प्राणी को उद्वेग कैसे पहुँचा सकता है। फिर भी देखने में आता है कि लोग ईर्ष्यावश उनसे उद्विग्न हो जाते हैं और अकारण ही द्वेष और विरोध करने लगते हैं।
जो उनसे द्वेष करता है, वह अपने राग-द्वेष से युक्त असुर स्वभाव के कारण ही उनसे द्वेष करता है। इसमें भक्त का क्या दोष ? भर्तृहरिजी कहते हैं –
हरिण, मछली और सज्जन क्रमशः तृण, जल और संतोष पर अपना जीवन निर्वाह करते हैं, परन्तु व्याध, मछुए और दुष्ट लोग अकारण ही इनसे वैर करते हैं।
(2) फिर कृष्ण कहते हैं कि भक्त को स्वयं भी किसी से उद्वेग नहीं होता। कारण –
(क) भक्त कृष्ण प्रेम में इतना निमग्न होता है कि उसको सर्वत्र और सबमें कृष्ण के ही दर्शन होते हैं। इसलिये उसे उन प्राणियों की क्रियाएँ कृष्ण की लीलाएँ ही प्रतीत होती है।
(ख) किसी की उन्नति को सहन न करना अमर्ष (ईर्ष्या) कहलाता है। कई बार साधकों के अन्तःकरण में दूसरे साधकों की आध्यात्मिक उन्नति और प्रसन्नता देख कर व सुनकर ईर्ष्या का भाव पैदा हो जाता है। पर भक्त के लिये कृष्ण के सिवाय अन्य किसी की सत्ता है ही नहीं, फिर वह किसके प्रति अमर्ष करे और क्यों करे ?
(ग) इष्ट के वियोग और अनिष्ट के संयोग की आशंका से होने वाले विकार को भय कहते हैं। पर भक्त सदैव कृष्ण के चरणों के आश्रित रहता है, इसलिये वह सदा सर्वदा भयरहित होता है।
(घ). मन का एकरूप न रहकर हलचलयुक्त हो जाना ‘उद्वेग‘ कहलाता है। उद्वेग के होने में अज्ञानजनित इच्छा और आसुर स्वभाव ही कारण है। कृष्ण की इच्छा ही भक्त की इच्छा होती है और आसुर स्वभाव तो उसका साधना अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। वह प्रत्येक परिस्थिति में कृष्ण का कृपापूर्ण विधान ही देखता है, अतः उद्वेग से वह सर्वथा रहित होता है।