Bhagavad Gita 12.20: Verse 20
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।12.20।।
भावार्थ - Gist
परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम ‘श्रद्धा’ है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं॥20॥
Those who cherish this nectar of sacred wisdom in their hearts just as it has been uttered by Me, and who, reposing complete faith in Me as their Supreme Lord, are exceedingly and inexpressibly dear to Me.

व्याख्या - Explanation
(1) सिद्ध भक्तों के लक्षणों में श्रद्धा की बात नहीं कही, क्योंकि सिद्ध भक्त वही है, जिसे कृष्ण प्राप्ति का अनुभव हो गया है और श्रद्धा की आवश्यकता कृष्ण प्राप्ति के अनुभव होने तक ही होती है। अतः इस पद को साधक श्रद्धालु भक्तों का वाचक ही मानना चाहिये।
(2) साधक सत्संग के साथ-साथ कुसंग भी करता है, संयम के साथ असंयम और साधन के साथ असाधन भी होता है। इससे साधना पूर्ण नहीं होती, क्योंकि असंयम, असाधन और अवगुण से साधक में अपनी साधना और गुणों का अभिमान रहता है, जो आसुरी सम्पत्ति का आधार है। इसलिये कृष्ण ने यह धर्ममय अमृत वचन जैसा कहा है, वैसा सेवन करने के लिये कहा है। इस विषय में साधक को विशेष सावधान रहना चाहिये। कृष्ण के द्वारा बताये हुए वचनों के सेवन में दोष भी साथ रहेंगे, तो कृष्ण प्राप्ति नहीं होगी। यदि किसी कारणवश आंशिक दोषमयी वृत्ति उत्पन्न हो जाय, तो उसकी अवहेलना न करके तत्परता से उसे हटाने की कोशिश करनी चाहिये। चेष्टा करने पर भी न हटे, तो व्याकुलतापूर्वक कृष्ण से प्रार्थना करनी चाहिये।
(3) साधक भक्तों को अत्यन्त प्रिय कहा और सिद्ध भक्तों को प्रिय ही कहा है। इसका कारण है-
(क) साधक भक्तों को अभी कृष्ण प्राप्ति नहीं हुई है। यदि वे फिर भी श्रद्धा-पूर्वक कृष्णभक्ति में लगे हैं, तो कृष्ण का उन्हें अत्यन्त प्रिय कहना बनता ही है।
(ख) सिद्ध भक्त कृष्ण के बड़े पुत्र और साधक भक्त छोटे पुत्र के समान होते हैं। छोटे पुत्र से प्रियता स्वाभाविक ही कुछ अधिक होती है।
(ग) दर्शन न देने के कारण कृष्ण अपने आपको उनका ऋणी मानते हैं, इसीलिये उनको अपना अत्यन्त प्रिय कहते हैं।