Bhagavad Gita 12.6: Verse 6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12.6।।
भावार्थ - Gist
परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। (इस श्लोक का विशेष भाव जानने के लिए गीता अध्याय 11 श्लोक 55 देखना चाहिए)॥6॥
But those, who, surrendering all actions to Me, repose unswerving faith in Me, and meditating upon Me with the consciousness of belonging solely to Me, worship Me with the single-minded devotion.

व्याख्या - Explanation
(1) यहाँ कृष्ण का आशय कर्मों का स्वरूप से त्याग करने का नहीं है, अपितु कर्मों में ममता, आसक्ति और फलेच्छा का त्याग करने का है। बन्धनकारी कर्म नहीं हैं, वरन् उनमें ममता, आसक्ति और फल की इच्छा है। साधक का लक्ष्य भगवत्प्राप्ति का होता है, अतः अपने-आपको भगवान् का मानने से उसकी ममता शरीरादि से हटकर एक भगवान् में ही हो जाती है।
(2) कृष्ण के लिये कर्म करने के कई प्रकार हैं:-
(क) जिनका उद्देश्य पहले कुछ अलग हो, किन्तु कर्म करते समय, या बाद में उन्हें कृष्ण के अर्पण कर दिया जाये।
(ख) जो कर्म आरम्भ से ही कृष्ण के लिये किये जायें अथवा जो भगवत्सेवा स्वरूप हों (भगवत्प्राप्ति के लिये कर्म करना, भगवान् की आज्ञा मानकर कर्म करना और भगवान् की प्रसन्नता के लिये कर्म करना)।
(ग) भगवान् का ही काम समझकर सम्पूर्ण लौकिक कार्य (व्यापार, नौकरी आदि) करना और
(घ) भगवत् सम्बन्धी कार्य (जप, ध्यान आदि) करना।