Bhagavad Gita 15.18: Verse 18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।15.18।।
भावार्थ - Gist
क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ৷৷15.18৷৷
As I transcend the perishable and am greater than the imperishable, I am glorified as Purshottam (Supreme person) in the world as well as in the vedas.

व्याख्या - Explanation
1) क्योंकि क्षर प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मैं (कृष्ण) नित्य निरन्तर निर्विकार रूप से ज्यों का त्यों रहने वाला हूँ इसलिये मैं क्षर से अतीत हूँ।
2) यहाँ कृष्ण अपने को जीवात्मा से भी उत्तम बताते हैं। इसके कारण हैं-
(क) जीव प्रकृति के साथ सम्बन्ध मान कर प्रकृति के गुणों से मोहित हो जाता है, जबकि कृष्ण कभी मोहित नहीं होते। (7.13)
(ख) कृष्ण अपनी प्रकृति को अधीन करके अवतार लेते हैं (4.6), जबकि जीव प्रकृति के वश में होकर शरीर धारण करता है। (8.19)
(ग) कृष्ण सदैव निर्लिप्त रहते हैं (4.14, 9.19), जबकि जीवात्मा को निर्लिप्त रहने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है। (4.18)
1 Because the perishable (kshetra) is changing every moment, while I, Krishna, remain continuously and forever without changes or distortions, therefore I am beyond kshetra.
2 Here Krsihna describes Himself as superior even to even to the imperishable spirit. The reasons behind this are given below: