Bhagavad Gita 16.24: Verse 24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।
भावार्थ - Gist
इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥16.24॥
Therefore in order to discriminate between what is duty and what is not your duty, recognize the scriptures as the true authority. Knowing by the ordinance of the scriptures what is your prescribed duty, you will be capable of performing those prescribed actions.

व्याख्या - Explanation
.(1) तू कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय करने के लिये शास्त्र को सामने रख। जिनकी महिमा शास्त्रों ने गायी है और जिनका आचरण शास्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार होता है, ऐसे संत-महापुरुषों के वचनों और आचरण के अनुसार चलना भी शास्त्रों के अनुसार ही चलना है। ऐसे महापुरुष शास्त्रों के अनुसार आचरण करने से ही श्रेष्ठ बने हैं।
(2) अर्जुन समझ रहा था कि युद्ध करने से उसे पाप लगेगा और कृष्ण ने 2.32 में बताया कि अपने-आप प्राप्त धर्ममय युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही प्राप्त होता है। यह स्वर्ग को देने वाला है। अतः अब कृष्ण कह रहे हैं कि तू पाप-पुण्य का निर्णय अपने मनमाने ढंग से कर रहा है, तुझे तो इस विषय में शास्त्र को ही प्रमाण रखना चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि युद्ध रूप क्रिया बाँधने वाली नहीं है, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान रखकर की हुई शास्त्रीय क्रिया (यज्ञ, दान आदि) भी बाँधने वाली हो जाती है और मनमाने ढंग से (शास्त्र के विपरीत) की हुई क्रिया तो पतन करने वाली होती है।